Iraq से US-NATO की वापसी ने मिडिल ईस्ट का Power Map हिला दिया

Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

बगदाद की सुबह आज अलग थी। हवा में बारूद नहीं, बल्कि एक खामोश बदलाव तैर रहा था। जिन सैन्य ठिकानों पर कभी अमेरिकी बूटों की गूंज थी, वहां अब सन्नाटा अपनी नई हुकूमत लिख रहा है। अल-असद एयर बेस… जो दो दशकों तक सुपरपावर का प्रतीक था, अब पूरी तरह इराकी नियंत्रण में है।

ये सिर्फ सैनिकों की वापसी नहीं, बल्कि global chessboard पर एक चाल है… और मोहरे तेजी से अपनी जगह बदल रहे हैं।

इराक में ‘खाली होते किले’

इराकी रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि कर दी है कि आखिरी अमेरिकी सैन्य सलाहकार भी देश छोड़ चुके हैं। अल-असद जैसे प्रमुख बेस अब स्थानीय सुरक्षा बलों के हाथ में हैं।

यह वही जगह है जहां कभी रणनीति बनती थी, ड्रोन उड़ते थे और फैसले दुनिया की दिशा तय करते थे। अब वहां सिर्फ सवाल बचा है—
“क्या ये वापसी मजबूरी है या मास्टरस्ट्रोक?”

NATO का भी ‘बैकफुट मोड’

2018 से चल रहा NATO का ट्रेनिंग मिशन अब इतिहास बन चुका है। मार्च 2026 में ईरान संघर्ष के बढ़ते तापमान ने NATO को अपने सैनिक यूरोप शिफ्ट करने पर मजबूर कर दिया। अब सपोर्ट ‘रिमोट कंट्रोल’ से होगा—इटली के नेपल्स से। यानी मैदान छोड़ दिया गया है, लेकिन गेम अभी खत्म नहीं हुआ।

ईरान फैक्टर: असली गेमचेंजर

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक नाम बार-बार उभरता है—ईरान। ईरान समर्थित मिलिशिया ग्रुप्स ने अमेरिकी बेसों पर लगातार दबाव बनाए रखा। संदेश साफ था “अब यह इलाका बाहरी ताकतों का नहीं, क्षेत्रीय खिलाड़ियों का है।”

जॉर्डन से वायरल तस्वीरें: ‘Silent Retreat’

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में अमेरिकी सैन्य काफिले जॉर्डन में पीछे हटते दिखे। कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, कोई विजय भाषण नहीं—बस चुपचाप वापसी। यह वही ‘साइलेंट एग्जिट’ है जो इतिहास की किताबों में बहुत कुछ कह जाता है।

एक्सपर्ट व्यू: अजीत उज्जैनकर की नजर

डिफेंस एक्सपर्ट अजीत उज्जैनकर कहते हैं, “यह वापसी केवल सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संतुलन है। अमेरिका अब सीधे टकराव से बचते हुए ‘इंडायरेक्ट कंट्रोल’ की नीति अपना रहा है। Middle East में power vacuum बनेगा, जिसे क्षेत्रीय ताकतें भरेंगी।”

सीधी भाषा में समझिए “मैदान खाली हुआ है, लेकिन खिलाड़ी और खतरनाक हो गए हैं।”

कुर्दिस्तान: अधूरी कहानी

हालांकि पूरा इराक खाली नहीं हुआ है। कुर्दिस्तान क्षेत्र में अभी भी अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं, और सितंबर 2026 तक पूरी वापसी की बात कही जा रही है। यानी यह अंत नहीं…एक लंबा ट्रांजिशन है, जहां हर दिन नई चाल चलेगी।

बड़ा सवाल: क्या दुनिया नए ‘Power Order’ में प्रवेश कर रही है?

इराक से US और NATO की वापसी एक संकेत है— दुनिया अब unipolar नहीं रही। Middle East अब एक खुला अखाड़ा बन चुका है, जहां हर ताकत अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। और इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट यही है— जो जा रहा है, वो हार नहीं मान रहा… और जो आ रहा है, वो सिर्फ जगह नहीं, वर्चस्व चाहता है।

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